उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pyar ke bandhan kaT rahe hain prem ka rishta toD rahe hain

प्यार के बंधन काट रहे हैं प्रेम का रिश्ता तोड़ रहे हैं

پیار کے بندھن کاٹ رہے ہیں پریم کا رشتہ توڑ رہے ہیں

शायर: Parkash Nath Parvez6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

प्यार के बंधन काट रहे हैं प्रेम का रिश्ता तोड़ रहे हैं
शहर-ए-मोहब्बत के बाशिंदे शहर-ए-मोहब्बत छोड़ रहे हैं

अरमानों के रह-वारों को जानिब-ए-दुनिया मोड़ रहे हैं
उल्फ़त का दम भरने वाले उल्फ़त का दिल तोड़ रहे हैं

इतना हम को इल्म नहीं था हिज्र के सदमे सहने होंगे
ये क़तअन एहसास नहीं था किस से नाता जोड़ रहे हैं

इस बस्ती में रहना बसना अपने बस की बात नहीं है
ख़ुद्दारी की फ़रमाइश पर शहर-ए-मोहब्बत छोड़ रहे हैं

देखें अपनी सरकश तौबा साथ हमारा देती भी है
आप तो नफ़रत के पत्थर पर जाम-ए-मोहब्बत फोड़ रहे हैं

ऐ 'परवेज़' ये दुनिया वाले तदबीरों से ग़ाफ़िल हो कर
क़िस्मत की दहलीज़ पे नाहक़ अपने सर को फोड़ रहे हैं