उर्दू शायरी · ग़ज़ल

purkhon ki bu bas liye phirta hun

पुरखों की बू बास लिए फिरता हूँ

پرکھوں کی بو باس لیے پھرتا ہوں

शायर: Badr Jameel5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पुरखों की बू बास लिए फिरता हूँ
मुट्ठी भर एहसास लिए फिरता हूँ

चारों ओर समुंदर और मैं पल पल
एक अनजानी प्यास लिए फिरता हूँ

राम को तो बन-बास लिए फिरता था
मैं ख़ुद में बन-बास लिए फिरता हूँ

महफ़िल महफ़िल ख़ेमा-ज़न मायूसी
मंज़िल मंज़िल आस लिए फिरता हूँ

हर मौसम का कर्ब छुपा है मुझ में
मैं हर रुत की प्यास लिए फिरता हूँ