उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pahle to kabhi waqt ye hum par nahin aaya

पहले तो कभी वक़्त ये हम पर नहीं आया

پہلے تو کبھی وقت یہ ہم پر نہیں آیا

शायर: Badr Jameel4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पहले तो कभी वक़्त ये हम पर नहीं आया
हम चलते रहे चलते रहे घर नहीं आया

क्या लोग थे बस्ती में कि जलती रही बस्ती
और घर से निकल कर कोई बाहर नहीं आया

क्यों वलवले महदूद हुए लफ़्ज़-ओ-बयाँ तक
क्यों दार तलक कोई क़द-आवर नहीं आया

इस बार भी क्या यूँही गुज़र जाएगा सावन
इस बार भी तो पेड़ पे पत्थर नहीं आया