उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pukare ja rahe ho ajnabi se chahte kya ho

पुकारे जा रहे हो अजनबी से चाहते क्या हो

پکارے جا رہے ہو اجنبی سے چاہتے کیا ہو

शायर: Zafar Gorakhpuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पुकारे जा रहे हो अजनबी से चाहते क्या हो
ख़ुद अपने शोर में गुम आदमी से चाहते क्या हो

ये आँखों में जो कुछ हैरत है क्या वो भी तुम्हें दे दें
बना कर बुत हमें अब ख़ामुशी से चाहते क्या हो

न इत्मिनान से बैठो न गहरी नींद सो पाओ
मियाँ इस मुख़्तसर सी ज़िंदगी से चाहते क्या हो

उसे ठहरा सको इतनी भी तो वुसअत नहीं घर में
ये सब कुछ जान कर आवारगी से चाहते क्या हो

किनारों पर तुम्हारे वास्ते मोती बहा लाए
घरौंदे भी नहीं तोड़े नदी से चाहते क्या हो

चराग़-ए-शाम-ए-तन्हाई भी रौशन रख नहीं पाए
अब और आगे हवा की दोस्ती से चाहते क्या हो