उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pite hi surKH aankhen hain mast-e-sharab ki

पीते ही सुर्ख़ आँखें हैं मस्त-ए-शराब की

پیتے ہی سرخ آنکھیں ہیں مست شراب کی

शायर: Qamar Jalalvi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पीते ही सुर्ख़ आँखें हैं मस्त-ए-शराब की
गर्मी तो देखो डूबे हुए आफ़्ताब की

रुख़ से जुदा जो हश्र में तुम ने नक़ाब की
दुनिया ये ताब लाएगी दो आफ़्ताब की

साक़ी ये रक़म सच है जो मुझ पर हिसाब की
बोतल पे हाथ रख के क़सम खा शराब की

क्या कम था हुस्न-ए-बाग़ कि ऐ बाग़बान-ए-हुस्न
इक शाख़ तू ने और लगा दी शबाब की

वो तो रहा कलीम के इसरार का जवाब
और ये जो तू ने तूर की मिट्टी ख़राब की

मूसा को उस ने सर पे चढ़ाया भी था बहुत
जल्वे ने ख़ूब तूर की मिट्टी ख़राब की

फेरो न आँखें तुम मिरे अश्कों के जोश पर
तूफ़ाँ में डूबती नहीं कश्ती हबाब की

अल्लाह उस का कुछ भी जवानी पे हक़ नहीं
बरसों दुआएँ माँगी हैं जिस ने शबाब की

रखिए मुआ'फ़ शैख़-जी मस्जिद में हज्व-ए-मय
बातें ख़ुदा के घर में न कीजे शराब की

बाग़-ए-जहाँ में और भी तुम से तो हैं मगर
हर फूल में नहीं है नज़ाकत गुलाब की

जब से गए हैं देख के तारे वो ऐ 'क़मर'
सूरत बदल गई है शब-ए-माहताब की