उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pir-e-mai-KHana pe marte hain muridon ki tarah

पीर-ए-मय-ख़ाना पे मरते हैं मुरीदों की तरह

پیر مے خانہ پہ مرتے ہیں مریدوں کی طرح

शायर: Saba Naqvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पीर-ए-मय-ख़ाना पे मरते हैं मुरीदों की तरह
जान देते हैं मोहब्बत में शहीदों की तरह

इन्हीं कलियों का लहू ज़ेब-ए-बहाराँ तो नहीं
मिल गईं ख़ाक में जो मेरी उम्मीदों की तरह

हम ने देखे हैं कुछ ऐसे भी क़राबत वाले
पेश आते हैं जो अपनों से यज़ीदों की तरह

हाए वो कैफ़ में डूबी हुई बीती घड़ियाँ
याद आती हैं जो गुज़री हुई ईदों की तरह

उन से उम्मीद-ए-मोहब्बत कोई क्या रखे 'सबा'
फिर गए जो किसी बीमार के दीदों की तरह