उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil-e-muztar ko samjha lun bahut hai

दिल-ए-मुज़्तर को समझा लूँ बहुत है

دل مضطر کو سمجھا لوں بہت ہے

शायर: Saba Naqvi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल-ए-मुज़्तर को समझा लूँ बहुत है
मैं ख़ुद से अपना घर छालूँ बहुत है

मैं अपनी ज़िंदगी-ए-बेवफ़ा को
वफ़ा के जाम में ढालूँ बहुत है

भिगो कर आँसुओं से अपना चेहरा
सफ़र की गर्द धो डालूँ बहुत है

सुकूत-ए-अंजुमन टूटे न टूटे
ब-शौक़-ए-ज़मज़मा गा लूँ बहुत है

नवाह-ए-ज़िंदगी में इक ज़रा सा
फ़रेब-ए-दोस्ती खा लूँ बहुत है

कोई भूला सबक़ पारीना क़िस्सा
मैं दिल ही दिल में दोहरा लूँ बहुत है

न जाए राएगाँ ज़ौक़-ए-तजस्सुस
मैं अपने आप को पा लूँ बहुत है

जो संग-ए-मील रहज़न के लिए है
वो संग-ए-राह उठवा लूँ बहुत है

'सबा' दीवार-ए-ज़िंदान-ए-बला से
मैं अपने सर को टकरा लूँ बहुत है