उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kho gai ghairat-e-dil zauq-e-talab baqi hai

खो गई ग़ैरत-ए-दिल ज़ौक़-ए-तलब बाक़ी है

کھو گئی غیرت دل ذوق طلب باقی ہے

शायर: Saba Naqvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

खो गई ग़ैरत-ए-दिल ज़ौक़-ए-तलब बाक़ी है
कैसे मर जाऊँ कि जीने का सबब बाक़ी है

जल्वा-ए-सुब्ह का मंज़र है गुलिस्ताँ में तो क्या
आशियानों में अभी ज़ुल्मत-ए-शब बाक़ी है

नश्र हो जाएगी ख़ुद कुल्फ़त-ए-दौराँ की हदीस
तेरे शाइ'र में अगर जुरअत-ए-लब बाक़ी है

हुस्न और इश्क़ में इक ख़ास है रब्त-ए-उल्फ़त
दिल सलामत है तो फिर चश्म-ए-ग़ज़ब बाक़ी है

कूचा-ए-इश्क़ में दिल आज भी है सरगर्दां
अब भी वो शेफ़्ता-ए-आरिज़-ओ-लब बाक़ी है

जब तलक दहर में ज़िंदा है ज़बान-ए-उर्दू
रौनक़-ए-अंजुमन-ए-शेर-ओ-अदब बाक़ी है

गर्दिश-ए-वक़्त की रफ़्तार बताती है 'सबा'
चश्मक-ए-सोज़-ए-अलम साज़-ए-तरब बाक़ी है