उर्दू शायरी · ग़ज़ल

phir pareshan-haal hai qalb-o-jigar kya kijiye

फिर परेशाँ-हाल है क़ल्ब-ओ-जिगर क्या कीजिए

پھر پریشاں حال ہے قلب و جگر کیا کیجئے

शायर: Pandit Vidya Ratan Aasi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फिर परेशाँ-हाल है क़ल्ब-ओ-जिगर क्या कीजिए
अब इलाज-ए-गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर क्या कीजिए

मेहरबाँ हो भी अगर अब चारागर क्या कीजिए
कर चुका है दर्द ही इस दिल में घर क्या कीजिए

देखिए कब मौत का झोंका बुझा डाले इसे
ज़िंदगी है इक चराग़-ए-रहगुज़र क्या कीजिए

हम से होता ही नहीं दर्द-ए-मोहब्बत का इलाज
अब यही करते हैं हम कुछ सोच कर क्या कीजिए

राहत-ओ-आराम का इस में नहीं कोई गुज़र
हो रही है ज़िंदगी फिर भी बसर क्या कीजिए

जब हमारे लब पे आती है कभी मतलब की बात
हँस दिया करते हैं वो मुँह फेर कर क्या कीजिए

सोचते हैं हाल-ए-दिल हो किस तरह उन से बयाँ
वो बिगड़ जाते हैं हर इक बात पर क्या कीजिए

हम ने जिन की चाह में बर्बाद कर दी ज़िंदगी
हम पे होती ही नहीं उन की नज़र क्या कीजिए

हम ने 'आसी' उन का हर इल्ज़ाम अपने सर लिया
अपने दुश्मन थे हमीं कुछ इस क़दर क्या कीजिए