उर्दू शायरी · ग़ज़ल

phir mere shahr se guzra hai wo baadal ki tarah

फिर मिरे शहर से गुज़रा है वो बादल की तरह

پھر مرے شہر سے گزرا ہے وہ بادل کی طرح

शायर: Parveen Shakir6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फिर मिरे शहर से गुज़रा है वो बादल की तरह
दस्त-ए-गुल फैला हुआ है मिरे आँचल की तरह

कह रहा है किसी मौसम की कहानी अब तक
जिस्म बरसात में भीगे हुए जंगल की तरह

पास जब तक वो रहे दर्द थमा रहता है
फैलता जाता है फिर आँख के काजल की तरह

ऊँची आवाज़ में तो उस ने कभी बात न की
ख़फ़गियों में भी वो लहजा रहा कोमल की तरह

रोज़ उस जिस्म के आसेब-ज़दा मंदिर में
दिल सर-ए-शाम सुलग उठता है संदल की तरह

मिल के उस शख़्स से मैं लाख ख़मोशी से चलूँ
बोल उठती है नज़र पाँव की छागल की तरह