उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pahle ek mauj-e-hawa aati hai

पहले इक मौज-ए-हवा आती है

پہلے اک موج ہوا آتی ہے

शायर: Obaid Siddiqi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पहले इक मौज-ए-हवा आती है
और फिर घिर के घटा आती है

ऐसा सन्नाटा कभी होता है
दिल धड़कने की सदा आती है

ज़ुल्म को देख के चुप रहते हैं
हम को जीने से हया आती है

मैं तो अब हाथ उठाता ही नहीं
क्या तुम्हें कोई दुआ आती है

किस लिए बंद किए बैठे हो
इन दरीचों से हवा आती है