उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab ye sifat jahan mein nayab ho gai hai

अब ये सिफ़त जहाँ में नायाब हो गई है

اب یہ صفت جہاں میں نایاب ہو گئی ہے

शायर: Obaid Siddiqi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब ये सिफ़त जहाँ में नायाब हो गई है
मलमल बदन पे उस के कम-ख़्वाब हो गई है

कोई पता दे उस को मेरी किताब-ए-जाँ का
दुनिया के साथ वो भी इक बाब हो गई है

फूलों-भरी ज़मीं हो ख़ुश्बू-भरी हों साँसें
ये आरज़ू भी मेरी क्या ख़्वाब हो गई है

मैं बस ये कह रहा हूँ रस्म-ए-वफ़ा जहाँ में
बिल्कुल नहीं मिटी है कमयाब हो गई है

तकमील पा रहा है ये किस के घर का नक़्शा
दीवारें उठ चुकी हैं मेहराब हो गई है

चश्मे उबल रहे हैं दश्त ओ जबल से कैसे
क्या ये ज़मीन इतनी सैराब हो गई है