उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pagDanDi lag rahi thi pahaDon ke darmiyan

पगडंडी लग रही थी पहाड़ों के दरमियाँ

پگڈنڈی لگ رہی تھی پہاڑوں کے درمیاں

शायर: Danish Aziz9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पगडंडी लग रही थी पहाड़ों के दरमियाँ
निकली हुई थी माँग यूँ बालों के दरमियाँ

पहले तकल्लुफ़ात सभी बरतरफ़ हुए
फिर गुफ़्तुगू शुरूअ' हुई आँखों के दरमियाँ

हिज्र-ओ-फ़िराक़ और ये तन्हाई मार दे
वक़्फ़ा अगर न दिन का हो रातों के दरमियाँ

सीने पे हाथ क्या रखा धड़कन सँभल गई
हिचकी सी एक क़ैद थी साँसों के दरमियाँ

कम-बख़्त सब के सामने ले दे न तेरा नाम
मैं ने ज़बान दाब ली दाँतों के दरमियाँ

क़ाएम है उस के दम से ही दम-ख़म अना ग़ुरूर
सर नाम की जो चीज़ है शानों के दरमियाँ

पहले मैं बात कर लूँ ज़रा ग़म-शनास की
तेरा भी होगा तज़्किरा शे'रों के दरमियाँ

कमज़ोर सी नहीफ़ सी बुलबुल के वास्ते
घमसान की लड़ाई थी चीलों के दरमियाँ

सादा-दिली तो देखिए 'दानिश-अज़ीज़' की
इक घर बना रहा है मकानों के दरमियाँ