उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nur ki kiran us se KHud nikalti rahti hai

नूर की किरन उस से ख़ुद निकलती रहती है

نور کی کرن اس سے خود نکلتی رہتی ہے

शायर: Ejaz Siddiqi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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नूर की किरन उस से ख़ुद निकलती रहती है
वक़्त कटता रहता है रात ढलती रहती है

और ज़िक्र क्या कीजे अपने दिल की हालत का
कुछ बिगड़ती रहती है कुछ सँभलती रहती है

ज़ेहन उभार देता है नक़्श हाल-ओ-माज़ी के
इन दिनों तबी'अत कुछ यूँ बहलती रहती है

तह-नशीन मौजें तो पुर-सुकून रहती हैं
और सत्ह-ए-दरिया की मौज उछलती रहती हैं

ज़िंदगी 'इबारत है ज़िंदगी के मोड़ों से
पेच-ओ-ख़म हों कितने ही राह चलती रहती है

चाहे अपने ग़म की हो या ग़म-ए-ज़माना की
बात तो बहर-सूरत कुछ निकलती रहती है

ज़िंदगी है नाम इस का ताज़गी है काम इस का
एक मौज-ए-ख़ूँ दिल से जो उबलती रहती है

कैफ़ भी है मस्ती भी ज़हर भी है अमृत भी
वो जो जाम-ए-साक़ी से रोज़ ढलती रहती है

ख़ुद वजूदियत हो ये या हो उस की तन्हाई
रूह को मगर कोई शय मसलती रहती है

आज भी बुरी क्या है कल भी ये बुरी क्या थी
इस का नाम दुनिया है ये बदलती रहती है

होती है वो शे'रों में मुन’अकिस कभी 'ए'जाज़'
मुद्दतों घुटन सी जो दिल में पलती रहती है