उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nau-giraftar-e-mohabbat kabhi aazad na ho

नौ-गिरफ़्तार-ए-मोहब्बत कभी आज़ाद न हो

نو گرفتار محبت کبھی آزاد نہ ہو

शायर: Pandit Jagmohan Nath Raina Shauq7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नौ-गिरफ़्तार-ए-मोहब्बत कभी आज़ाद न हो
क़ैद में क़ैद रहे क़ैद की मीआ'द न हो

मैं तो ख़ामोश रहूँ हिज्र में डर है लेकिन
दर्द उठ कर कहीं आमादा-ए-फ़रियाद न हो

तुम में पिन्हाँ हैं मोहब्बत के हज़ारों जल्वे
ऐ मिरी ख़ाक के ज़र्रो कहीं बरबाद न हो

कुछ हैं बिखरे हुए पर कुंज-ए-क़फ़स के बाहर
ख़ौफ़ है और भी रुस्वा कहीं सय्याद न हो

फूट कर किस के ये रोने की सदा आती है
दर्द-ए-उल्फ़त कहीं मेरा दिल-ए-नाशाद न हो

दिल की ईज़ा-तलबी पूछ लूँ क्या कहती है
ठहरो ठहरो अभी दम-भर कोई बेदाद न हो

'शौक़' कर दूँ जो बयाँ काविश-ए-ग़म की हालत
अपना क़िस्सा भी कम-अज़ क़िस्सा-ए-फ़रहाद न हो