उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chura na aankh ko saqi ki baada-nosh hun main

चुरा न आँख को साक़ी कि बादा-नोश हूँ मैं

چرا نہ آنکھ کو ساقی کہ بادہ نوش ہوں میں (ردیف .. ر)

शायर: Pandit Jagmohan Nath Raina Shauq5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चुरा न आँख को साक़ी कि बादा-नोश हूँ मैं
अभी तो फ़ैसला होता है एक साग़र पर

मरीज़-ए-इश्क़ की हालत कभी न सँभलेगी
मुझे तो छोड़ दे ऐ चारा-गर मुक़द्दर पर

हमारे नाले भी थक थक के अब तो बैठ रहे
गए वो दिन कि उठाते थे आसमाँ सर पर

हमारे मय-कदा को छोड़ कर न जा ज़ाहिद
मिलेगा क़तरा न कम-बख़्त हौज़-ए-कौसर पर

गिला न हम ने किया 'शौक़' उस सितमगर से
बलाएँ सब वो उठाईं जो आ पड़ीं सर पर