उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na thi hamari KHata etiraf kya karte

न थी हमारी ख़ता ए'तिराफ़ क्या करते

نہ تھی ہماری خطا اعتراف کیا کرتے

शायर: Zafar Moradabadi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न थी हमारी ख़ता ए'तिराफ़ क्या करते
थे बे-गुनाह तो मुंसिफ़ मु'आफ़ क्या करते

कोई न था जो यहाँ अपना जाएज़ा लेता
हर आइने से हमीं गर्द साफ़ क्या करते

न गुफ़्तुगू का सलीक़ा न काट लहजे में
समा'अतों में सुख़नवर शिगाफ़ क्या करते

ख़ला-नवर्द थे इस दौर में हम अहल-ए-जुनूँ
हमारे गिर्द बगूले तवाफ़ क्या करते

सिपुर्द-ए-ताक़ थे हर घर में शाहकार-ए-हयात
हिफ़ाज़त उन की अकेले ग़िलाफ़ क्या करते

सभी थे अहल-ए-नज़र इक हिसार तक महदूद
उतरते तह में तो फिर इंकिशाफ़ क्या करते

मिरी तरह जिन्हें मा'नी की जुस्तुजू भी नहीं
हिसार-ए-लफ़्ज़ में वो ऐ'तकाफ़ क्या करते

अज़िय्यतें जिन्हें देती हों राहतों की नवीद
तिरे सितम से भी वो इख़्तिलाफ़ क्या करते

वो अपनी फ़िक्र में ज़िंदा है हर्फ़ हर्फ़ 'ज़फ़र'
हरीफ़-ए-फ़न भी कुछ उस के ख़िलाफ़ क्या करते