उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na mahram hai na koi raaz-dan hai

न महरम है न कोई राज़-दाँ है

نہ محرم ہے نہ کوئی رازداں ہے

शायर: Raaz Muradabadi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न महरम है न कोई राज़-दाँ है
मोहब्बत मेरे उन के दरमियाँ है

ख़बर अपनी न फ़िक्र-ए-दोस्ताँ है
ये दुनिया जैसे बज़्म-ए-ख़ुफ़्तगाँ है

ख़िरद मिन्नत-पज़ीर-ए-ईन-ओ-आँ है
जुनूँ बेगाना-ए-रस्म-ए-जहाँ है

मिरे तमकीन-ए-ग़म की ख़ैर या-रब
कोई फिर चश्म-ओ-दिल पे मेहरबाँ है

वफ़ा से इन दिनों बेज़ार है दिल
वफ़ा जैसे हदीस-ए-दीगराँ है

हमीं तन्हा नहीं बेज़ार दिल से
ये दिल ज़ालिम भी हम से बद-गुमाँ है

म'आज़-अल्लाह ज़ौक़-ए-तल्ख़-कामी
निगाह-ए-लुत्फ़ सा'इ-ए-राएगाँ है

क़दम उठते हैं जिस के वालिहाना
वही दर-अस्ल मीर-ए-कारवाँ है

वो आग़ाज़-ए-मोहब्बत का ज़माना
अब उस की याद भी दिल पर गिराँ है

ज़माना गोश-बर-आवाज़ है 'राज़'
मिरे लब पे ये किस की दास्ताँ है