उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na lazim tawaqqoa hai ahal-e-mahal se

न लाज़िम तवक़्क़ो है अहल-ए-महल से

نہ لازم توقع ہے اہل محل سے

शायर: Deepak Purohit5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न लाज़िम तवक़्क़ो है अहल-ए-महल से
करो ज़ीस्त शादाब इल्म-ओ-अमल से

हिजाब-ओ-हया सोचते रह गए हैं
मिली इश्क़ में कामयाबी पहल से

यूँ नाकामियाँ हम-सफ़र हैं मुसलसल
कि ले दे के उम्मीद है अब अजल से

हयात-ओ-फ़ना का ये क्या सिलसिला है
नहीं राज़ अफ़्शाँ हुआ ये अज़ल से

यतीमी-ओ-ला-वारसी बेवगी के
ब-जुज़ कुछ न हासिल है जंग-ओ-जदल से