उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na jalwon ki kasrat mein bahken nigahen

न जल्वों की कसरत में बहकें निगाहें

نہ جلووں کی کثرت میں بہکیں نگاہیں

शायर: Zaheen Shah Taji6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न जल्वों की कसरत में बहकें निगाहें
कि हैं हर क़दम पर तिरी जल्वा-गाहें

पड़ीं जब से दिल पर तुम्हारी निगाहें
खुलीं ज़िंदगी की नई शाह-राहें

इस अंदाज़ से वो छुपे जा रहे हैं
मगर और कुछ कह रही हैं निगाहें

ये दिल था कि आहों पे इतरा रहा था
हँसी में उड़ा ले गया कोई आहें

न आस अपने बस में न यास अपने बस में
वो आना भी चाहें न आना भी चाहें

'ज़हीन' अपने हस्त-ओ-‘अदम से ये पूछें
अगर हैं तो क्या हैं नहीं हैं तो क्या हैं