उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na gaya mar ke bhi nazron mein samana apna

न गया मर के भी नज़रों में समाना अपना

نہ گیا مر کے بھی نظروں میں سمانا اپنا

शायर: Bal Mukund Besabr5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न गया मर के भी नज़रों में समाना अपना
गोर ने मर्दुम-ए-दीदा मुझे जाना अपना

ऐसे सोएँगे शब-ए-हिज्र के जागे इक रोज़
होगा महशर में भी दुश्वार जगाना अपना

मिल के दिल उस से मिला हम से न फिर वा-ए-नसीब
निकला बेगाना वो हम ने जिसे जाना अपना

दिन कहीं रात कहीं सुब्ह कहीं शाम कहीं
हो तो बतलाएँ कहीं ठोर-ठिकाना अपना

तेरा एहसान न भूलूँगा कभू शौक़-ए-जफ़ा
काम था तेरा ही याद उस को दिलाना अपना