उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na bhul pae tumhein hadisa hi aisa tha

न भूल पाए तुम्हें हादिसा ही ऐसा था

نہ بھول پائے تمہیں حادثہ ہی ایسا تھا

शायर: Zafar Gorakhpuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न भूल पाए तुम्हें हादिसा ही ऐसा था
न भर सका कोई उस को ख़ला ही ऐसा था

वो मुझ में रह के मुझे काटता रहा पल-पल
ज़बाँ पे आ न सका माजरा ही ऐसा था

नज़र न आई कहीं दूर दूर तक कोई मौज
मैं ग़र्क़ हो गया तूफ़ाँ उठा ही ऐसा था

न आया लुत्फ़ किसी और ग़म को झेलने में
ग़म-ए-हयात तिरा ज़ाइक़ा ही ऐसा था

खुले तो लब मगर अल्फ़ाज़ दोनों सम्त न थे
मुकालिमा न हुआ मरहला ही ऐसा था

अब उस का रंज भी क्या क्यूँ लहूलुहान हैं पाँव
चले थे जिस पे 'ज़फ़र' रास्ता ही ऐसा था