उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mustaqar ki KHwahish mein muntashir se rahte hain

मुस्तक़र की ख़्वाहिश में मुंतशिर से रहते हैं

مستقر کی خواہش میں منتشر سے رہتے ہیں

शायर: Sabir5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुस्तक़र की ख़्वाहिश में मुंतशिर से रहते हैं
बे-कनार दरिया में लफ़्ज़ लफ़्ज़ बहते हैं

सब उलट-पलट दी हैं सर्फ़-ओ-नहव-ए-देरीना
ज़ख़्म ज़ख़्म जीते हैं लम्हा लम्हा सहते हैं

यार लोग कहते हैं ख़्वाब का मज़ार उस को
अज़-रह-ए-रिवायत हम ख़्वाब-गाह कहते हैं

रौशनी की किरनें हैं या लहू अँधेरे का
सुर्ख़-रंग क़तरे जो रौज़नों से बहते हैं

ये क्या बद-मज़ाक़ी है गर्द झाड़ते क्यूँ हो
इस मकान-ए-ख़स्ता में यार हम भी रहते हैं