उर्दू शायरी · ग़ज़ल

musibat mein kisi ko mubtala koi nahin karta

मुसीबत में किसी को मुब्तला कोई नहीं करता

مصیبت میں کسی کو مبتلا کوئی نہیں کرتا (ردیف .. ے)

शायर: Om Prakash Laghar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुसीबत में किसी को मुब्तला कोई नहीं करता
बुरे आ'माल से ये अपने सर ख़ुद लाई जाती है

बहारों की तमन्ना ही नहीं ऐ बाग़बाँ या'नी
गुलों पर ताज़गी ख़ून-ए-जिगर से लाई जाती है

ज़रूरत है बसीरत आँख में पैदा हो राधा से
छबी घनश्याम की तो हर जगह ही पाई जाती है

ये दस्तूर-ए-कुहन है दोस्तो रिंदों की महफ़िल का
दिलों की बात मुश्किल से ज़बाँ पर लाई जाती है

अगरचे एक सी रूदाद है फ़र्हाद-ओ-मजनूँ की
मगर ये मुख़्तलिफ़ अंदाज़ से दोहराई जाती है

ये दुनिया हम को अब तक रास आई है न आएगी
ये माना दिलकशी इस में भी कुछ कुछ पाई जाती है

बशर की इज़्ज़त-ओ-अज़्मत ज़र-ओ-गौहर से क्या होगी
ये दौलत वज़्अ'-दारी ही में 'लाग़र' पाई जाती है