उर्दू शायरी · ग़ज़ल

musalahat mein koi shar na ho to achchha hai

मुसालहत में कोई शर न हो तो अच्छा है

مصالحت میں کوئی شر نہ ہو تو اچھا ہے

शायर: Danish Karanjavi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुसालहत में कोई शर न हो तो अच्छा है
फिर आस्तीनों में ख़ंजर न हो तो अच्छा है

दरिंदे शहर की सड़कों पे घूमते हों जहाँ
वहाँ हरीफ़ भी बे-घर न हो तो अच्छा है

जला के बस्तियाँ तो हट गया है मंज़र से
अब उस की ज़द में तिरा घर न हो तो अच्छा है

तिरी तलाश में आने लगा हूँ अपने क़रीब
तू मेरी ज़ात के अंदर न हो तो अच्छा है

उड़ा रहा हूँ पतंगें बना के शीशे की
हवा के हाथ में पत्थर न हो तो अच्छा है