उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hamare darmiyan kuchh silsile jaisa nahin lagta

हमारे दरमियाँ कुछ सिलसिले जैसा नहीं लगता

ہمارے درمیاں کچھ سلسلے جیسا نہیں لگتا

शायर: Danish Karanjavi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हमारे दरमियाँ कुछ सिलसिले जैसा नहीं लगता
सो उस से गुफ़्तुगू करना भी अब अच्छा नहीं लगता

ये मुमकिन है कि हक़-गोई में मेरा सर उतर जाए
तुम्हारे शहर का मुंसिफ़ मुझे सच्चा नहीं लगता

बुलंदी पेड़ से साए की चादर छीन लेती है
जो साया-दार होता है बहुत ऊँचा नहीं लगता

मैं क़ीमत देख कर इक दिन खिलौना छोड़ आया था
मगर बच्ची ने माँगा है तो अब महँगा नहीं लगता

अगर मोहलत मिले तो 'इश्क़ का इज़हार कर लेना
ज़ियादा सब्र भी करने से फल मीठा नहीं लगता