उर्दू शायरी · ग़ज़ल

munfarid lahja juda tarz-e-bayan rakhte hain hum

मुनफ़रिद लहजा जुदा तर्ज़-ए-बयाँ रखते हैं हम

منفرد لہجہ جدا طرز بیاں رکھتے ہیں ہم

शायर: Ibrahim Noori7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुनफ़रिद लहजा जुदा तर्ज़-ए-बयाँ रखते हैं हम
शायरी के वास्ते उर्दू ज़बाँ रखते हैं हम

याद-ए-जानाँ में गुज़रते हैं हमारे रोज़-ओ-शब
और किसी की याद की फ़ुर्सत कहाँ रखते हैं हम

कौन कहता है हमारे हाथ ख़ाली हो गए
माँ की सूरत में मता-ए-दो-जहाँ रखते हैं हम

ज़ीनत-ए-महफ़िल बढ़ाने के लिए ऐ जान-ए-जाँ
तेरी यादों का दिया भी दरमियाँ रखते हैं हम

आसमान-ए-ग़म का सूरज हम को क्या झुलसाएगा
तेरी उल्फ़त का जो सर पर साएबाँ रखते हैं हम

पेश-ए-ज़ालिम जुरअत-ए-इज़हार-ए-हक़ होती नहीं
ज़ाहिरन रखने को बस मुँह में ज़बाँ रखते हैं हम

क्या हुआ 'नूरी' अगर ये जिस्म बूढ़ा हो गया
जज़्बा-ए-इश्क़-ओ-मुहब्बत तो जवाँ रखते हैं हम