उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhe wo gham hai ki sari zamin rone lage

मुझे वो ग़म है कि सारी ज़मीन रोने लगे

مجھے وہ غم ہے کہ ساری زمین رونے لگے

शायर: Yasir Khan Inam5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझे वो ग़म है कि सारी ज़मीन रोने लगे
जो अश्क पोंछ दूँ तो आस्तीन रोने लगे

तुम्हें पता है मैं ऐसी जगह भी हँस आया
जहाँ पे ज़ब्त के सब माहिरीन रोने लगे

मदारी जानता था आख़िरी तमाशा है
सो खेल ऐसा किया नाज़िरीन रोने लगे

तिरे लबों पे उदासी थी एक लम्हे को
तिरी हँसी के सभी शाएक़ीन रोने लगे

कुछ ऐसे क़ैद किया है घरों में क़ुदरत ने
मकान हँसने लगे और मकीन रोने लगे