उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhe pahle ye lagta tha mera saya nahin koi

मुझे पहले ये लगता था मिरा साया नहीं कोई

مجھے پہلے یہ لگتا تھا مرا سایا نہیں کوئی

शायर: Yasir Malik6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझे पहले ये लगता था मिरा साया नहीं कोई
यक़ीं ख़ुद को दिलाया फिर मिरे जैसा नहीं कोई

मैं ज़र्रा हूँ मगर वुस'अत मिरी ख़ुद में समेटे जो
मुझे लगता है ऐसा रेत का दरिया नहीं कोई

तसव्वुर दिल ये करता है तिरे हर सम्त होने का
तलाशूँ गर तो नक़्श-ए-पा तिरा मिलता नहीं कोई

क़फ़स ये जिस्म है और रूह मेरी क़ैद है इस में
हक़ीक़त से मिरे ख़्वाबों का अब रिश्ता नहीं कोई

किया है ख़र्च मैं ने ख़ुद को तुम पर इस क़दर जाना
तलाशूँ तो भी मुझ सा राएगाँ मिलता नहीं कोई

बना कर ख़्वाब को मंज़िल चला उस राह पर 'यासिर'
जहाँ से वापसी का दोस्तों रस्ता नहीं कोई