उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujh mein se rafta rafta ghaTata raha mujhe

मुझ में से रफ़्ता रफ़्ता घटाता रहा मुझे

مجھ میں سے رفتہ رفتہ گھٹاتا رہا مجھے

शायर: Ehtisham ul Haq Siddiqui8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ में से रफ़्ता रफ़्ता घटाता रहा मुझे
वो थोड़ा थोड़ा रोज़ चुराता रहा मुझे

मेरे परों में मेरी ज़मीं बाँधने के बा'द
वो अपनी कहकशाँ में बुलाता रहा मुझे

हर रात आँसुओं से भिगोया मिरा बदन
हर सुब्ह धूप दे के सुखाता रहा मुझे

सिगरेट पीता मैं भी लबों से लगा रहा
वो भी धुआँ बना के उड़ाता रहा मुझे

उस को थी धुन कि मुझ को बनाएगा वो गुलाब
काँटों के बीच रोज़ सजाता रहा मुझे

पानी की तरह मैं भी था मुफ़्त उस के हाथ में
और वो भी बे-दरेग़ बहाता रहा मुझे

उस को ही मैं ने डस लिया इक रोज़ आख़िरश
जो अपनी आस्तीं में छुपाता रहा मुझे

उस के नमक से था मिरा पैकर बना हुआ
बारिश से इस लिए वो बचाता रहा मुझे