उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujh mein se mere jubba-o-dastar nafi kar

मुझ में से मिरे जुब्बा-ओ-दस्तार नफ़ी कर

مجھ میں سے مرے جبہ و دستار نفی کر

शायर: Ehtisham ul Haq Siddiqui8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ में से मिरे जुब्बा-ओ-दस्तार नफ़ी कर
रह जाऊँ अगर बाक़ी तो तशरीह मिरी कर

सब इल्म-ओ-हुनर भूल के बचपन में चला जाऊँ
ऐ साहब-ए-सहर ऐसी कोई जादूगरी कर

दीवारों से बटते हैं ख़िरद-मंदों के ख़ित्ते
तू दश्त-ए-जुनूँ में न ये दीवार खड़ी कर

इक क़ाफ़िला प्यासों का गुज़रना है यहाँ से
ऐ दश्त-ए-बला अपने सरापा को निरी कर

मैं घर में ही पीता हूँ मगर यारों की ख़ातिर
घर से तिरे मयख़ाने में आ जाता हूँ पी कर

इक चाक गरेबाँ में है इक चाक है दिल में
क्या होगा फ़क़त चाक-ए-गरेबान को सी कर

जो ज़ुल्म की रह पर हैं उन्हें राह से भटका
अच्छा भी कोई काम तू ऐ तीरा-शबी कर

गर कुछ भी नहीं पास तो मिट्टी से ही भर ले
ऐ साहब-ए-ख़ैरात तू दामन न तही कर