उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhko thapak thapak ke sulata raha charagh

मुझ को थपक थपक के सुलाता रहा चराग़

مجھ کو تھپک تھپک کے سلاتا رہا چراغ

शायर: Danish Aziz12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ को थपक थपक के सुलाता रहा चराग़
पहलू में रात भर मिरे बैठा रहा चराग़

कहता रहा कि रात ये कितनी हसीन है
तीरा-शबी का गिर्या भी करता रहा चराग़

सूरज का एक बार फ़क़त नाम क्या लिया
मुझ से तमाम रात ही लड़ता रहा चराग़

उस को मिरी शिकस्त की इतनी ख़ुशी हुई
हाथों पे हाथ मार के हँसता रहा चराग़

मैं उस की ज़र्द लौ में ख़ुदा देखता रहा
कमरे में रात भर मिरे जलता रहा चराग़

तब तक मिरे क़लम ने फ़क़त रौशनी लिखी
जब तक हथेली पर मिरी लिखता रहा चराग़

पहलू में उस के कल तिरी तस्वीर थी पड़ी
ग़ज़लें तिरे जमाल पे कहता रहा चराग़

आँखें मिरी भी सुर्ख़ थीं वो भी बुझा बुझा
यूँ मेरे साथ साथ ही रोता रहा चराग़

मैं उस के पास बैठ के कहता रहा ग़ज़ल
और पूरे इंहिमाक से सुनता रहा चराग़

कल उस के साथ मेरी बड़ी गुफ़्तुगू हुई
मेरी कहानी सुन के सिसकता रहा चराग़

तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ात का मीसाक़ जब हुआ
मेरे और उस के दरमियाँ बैठा रहा चराग़

जाने हवा ने क्या कहा कानों में उस के कल
'दानिश' तमाम रात मचलता रहा चराग़