उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhko samho na harf-e-ghalat ki tarah

मुझ को समझो न हर्फ़-ए-ग़लत की तरह

مجھ کو سمجھو نہ حرف غلط کی طرح

शायर: Zafar Kaleem4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ को समझो न हर्फ़-ए-ग़लत की तरह
सब्त हो जाऊँगा दस्तख़त की तरह

ग़ौर से पढ़ रहा हूँ ज़माने तुझे
अपने महबूब के पहले ख़त की तरह

वो हमेशा निगाहों में तन्हा रहा
साफ़ पानी में शफ़्फ़ाफ़ बत की तरह

हम ने पत्थर से हीरे तराशे 'ज़फ़र'
दस्त-ए-क़ुदरत के बे-मिस्ल क़त की तरह