उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhko KHak-e-dar-e-mai-KHana banaya hota

मुझ को ख़ाक-ए-दर-ए-मय-ख़ाना बनाया होता

مجھ کو خاک در مے خانہ بنایا ہوتا

शायर: Chandar Bhan Kaifi Dehelvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ को ख़ाक-ए-दर-ए-मय-ख़ाना बनाया होता
फिर उसी ख़ाक से पैमाना बनाया होता

जल्वा-गर हुस्न-ए-मजाज़ी में हक़ीक़त होती
का'बा-ए-दिल को सनम-ख़ाना बनाया होता

न मुझे रंग-ए-चमन से कोई मतलब होता
सूरत-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना बनाया होता

आप-बीती जो सुनाता हूँ तो कह देते हैं
इस से बेहतर कोई अफ़्साना बनाया होता

मय-कशों के जो मुक़द्दर में न थे ये दाने
नख़्ल-ए-अंगूर को बे-दाना बनाया होता

उम्र भर ख़ाना-ए-ख़ुम्मार में सर-ख़ुश रहते
ज़िंदगी का यही पैमाना बनाया होता

कुफ़्र-ओ-ईमाँ में न रहती ये कशाकश 'कैफ़ी'
का'बा-ओ-दैर को मय-ख़ाना बनाया होता