उर्दू शायरी · ग़ज़ल

muflison par jab kabhi aaya shabab

मुफ़लिसों पर जब कभी आया शबाब

مفلسوں پر جب کبھی آیا شباب

शायर: Pandit Vidya Ratan Aasi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुफ़लिसों पर जब कभी आया शबाब
घड़ लिए दुनिया ने क़िस्से बे-हिसाब

कौन जाने उन की क्या ता'बीर हो
हम ने आँखों में सजाए हैं जो ख़्वाब

लड़खड़ा जाएँ न क्यों हम बे-पिए
उन की आँखों से छलकती है शराब

हाए हम उस का मुक़द्दर क्या कहें
एक दिल है और ग़म हैं बे-हिसाब

लज़्ज़त-ए-शीरीनी-ए-हस्ती कहाँ
तल्ख़ियों में कट गया दौर-ए-शबाब

राहबर ने हर क़दम धोका दिया
मैं ये समझा मेरी क़िस्मत है ख़राब

दरहम-ओ-बरहम है नज़्म-ए-ज़िंदगी
ऐ ग़म-ए-दौराँ तिरा ख़ाना-ख़राब

होश कर ऐ शोख़ अब भी वक़्त है
तुझ को ले डूबेंगे ये जन्नत के ख़्वाब

हम से दुनिया ने छुपाए थे जो राज़
ख़ुद-ब-ख़ुद होने लगे वो बे-नक़ाब

ज़िंदगी भर हज़रत-ए-'आसी' रहे
रहगुज़ार-ए-शौक़ मैं ना-कामयाब