उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mohabbaton ke ye dariya utar na jaen kahin

मोहब्बतों के ये दरिया उतर न जाएँ कहीं

محبتوں کے یہ دریا اتر نہ جائیں کہیں

शायर: Obaidullah Aleem7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मोहब्बतों के ये दरिया उतर न जाएँ कहीं
जो दिल गुलाब हैं ज़ख़्मों से भर न जाएँ कहीं

अभी तो वा'दा-ओ-पैमाँ है और ये हाल अपना
विसाल हो तो ख़ुशी से ही मर न जाएँ कहीं

ये रंग चेहरे के और ख़्वाब अपनी आँखों के
हवा चले कोई ऐसी बिखर न जाएँ कहीं

झलक रहा है जिन आँखों से अब वुजूद मिरा
ये आँखें हाए ये आँखें मुकर न जाएँ कहीं

पुकारती ही न रह जाए ये ज़मीं प्यासी
बरसने वाले ये बादल गुज़र न जाएँ कहीं

निढाल अहल-ए-तरब हैं कि अहल-ए-गुलशन के
बुझे बुझे से ये चेहरे सँवर न जाएँ कहीं

फ़ज़ा-ए-शहर 'अक़ीदों की धुंद में है असीर
निकल के घर से अब अहल-ए-नज़र न जाएँ कहीं