उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mohabbat ki ranginiyan chhoD aae

मोहब्बत की रंगीनियाँ छोड़ आए

محبت کی رنگینیاں چھوڑ آئے

शायर: Habib Jalib9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मोहब्बत की रंगीनियाँ छोड़ आए
तिरे शहर में इक जहाँ छोड़ आए

पहाड़ों की वो मस्त शादाब वादी
जहाँ हम दिल-ए-नग़्मा-ख़्वाँ छोड़ आए

वो सब्ज़ा वो दरिया वो पेड़ों के साए
वो गीतों भरी बस्तियाँ छोड़ आए

हसीं पनघटों का वो चाँदी सा पानी
वो बरखा की रुत वो समाँ छोड़ आए

बहुत दूर हम आ गए उस गली से
बहुत दूर वो आस्ताँ छोड़ आए

बहुत मेहरबाँ थीं वो गुल-पोश राहें
मगर हम उन्हें मेहरबाँ छोड़ आए

बगूलों की सूरत यहाँ फिर रहे हैं
नशेमन सर-ए-गुलसिताँ छोड़ आए

ये ए'जाज़ है हुस्न-ए-आवारगी का
जहाँ भी गए दास्ताँ छोड़ आए

चले आए उन रह-गुज़ारों से 'जालिब'
मगर हम वहाँ क़ल्ब-ओ-जाँ छोड़ आए