उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere guman ki had se nikalne wala tha

मिरे गुमान की हद से निकलने वाला था

مرے گمان کی حد سے نکلنے والا تھا

शायर: Faizan Arif5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरे गुमान की हद से निकलने वाला था
वो मुझ से पहले ही रस्ता बदलने वाला था

तुझे ही जाने की उजलत थी ऐ मुसाफ़िर-ए-मन
वगर्ना मैं भी तिरे साथ चलने वाला था

जहाँ पे क़ाफ़िला-ए-सालार थक के बैठ गया
वहीं से इक नया रस्ता निकलने वाला था

नहीं थी मुझ को ज़रूरत किसी सहारे की
कि मैं तो आप ही गिर कर सँभलने वाला था

मैं लौट आया समुंदर से डर के जब 'फैज़ान'
उसी घड़ी वो ख़ज़ाना उगलने वाला था