उर्दू शायरी · ग़ज़ल

duaon ke diye jab jal rahe the

दुआओं के दिए जब जल रहे थे

دعاؤں کے دیے جب جل رہے تھے

शायर: Faizan Arif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दुआओं के दिए जब जल रहे थे
मिरे ग़म आँसुओं में ढल रहे थे

किसी नेकी का साया था सरों पर
जो लम्हे आफ़तों के टल रहे थे

हुआ एहसास ये आधी सदी ब'अद
यहाँ पर सिर्फ़ रस्ते चल रहे थे

वतन की अज़्मतों को डसने वाले
वतन की आस्तीं में पल रहे थे

बहुत नज़दीक थी मंज़िल हमारी
मगर सब रास्ते दलदल रहे थे

नहीं बदले अभी मुंसिफ़ यहाँ के
वही हैं फ़ैसले जो कल रहे थे

जहाँ फ़ैज़ान-ए-आबादी बहुत है
वहाँ पर भी घने जंगल रहे थे