उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jazbaat mein jo mere muqabil khaDe hue

जज़्बात में जो मेरे मुक़ाबिल खड़े हुए

جذبات میں جو میرے مقابل کھڑے ہوئے

शायर: Faizan Arif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जज़्बात में जो मेरे मुक़ाबिल खड़े हुए
एहसास तब हुआ मिरे बच्चे बड़े हुए

दुश्मन की ज़द से उस को बचा तो लिया मगर
सीने में मेरे तीर हैं अब तक गड़े हुए

नायाब किस क़दर हैं तुम्हें कुछ ख़बर नहीं
हम मिल गए जो राह में तुम को पड़े हुए

इक इश्क़ को तो ताज महल से मिला दवाम
इक इश्क़ की मिसाल वो कच्चे घड़े हुए

तक़दीर का उसूल है ऐ दोस्त सब्र कर
रोज़े रखे ग़रीब ने तो दिन बड़े हुए

वो क्या गया कि अब तो सभी कुछ बदल गया
पहले तो शब ही थी सो अब दिन भी कड़े हुए

'फैज़ान' ऐसे दिल में बसी है किसी की याद
जैसे अंगूठियों में नगीने जड़े हुए