उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh ehtimam safar ka zarur karna hai

कुछ एहतिमाम सफ़र का ज़रूर करना है

کچھ اہتمام سفر کا ضرور کرنا ہے

शायर: Faizan Arif6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ एहतिमाम सफ़र का ज़रूर करना है
कि उस के शहर से हो कर मुझे गुज़रना है

मैं चुप नहीं हूँ किसी मस्लहत के पेश-ए-नज़र
मैं जानता हूँ कहाँ इख़्तिलाफ़ करना है

हमारे जिस्म से पत्थर बंधे हुए हैं मगर
समुंदरों की तहों से हमें उभरना है

फिसल रही है जवानी की रेत मुट्ठी से
गुज़र रहे हैं मिरे दिन इन्हें गुज़रना है

ये काएनात की तस्वीर ना-मुकम्मल है
अभी तो इस में बहुत रंग उस ने भरना है

मिरा मिज़ाज नहीं है मगर मुझे 'फैज़ान'
किसी के वास्ते इक अहद से मुकरना है