उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere dimagh pe aaseb ka asar to nahin

मिरे दिमाग़ पे आसेब का असर तो नहीं

مرے دماغ پہ آسیب کا اثر تو نہیں

शायर: Qamar Abbas Qamar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरे दिमाग़ पे आसेब का असर तो नहीं
गुमाँ गुज़रता है ये दश्त मेरा घर तो नहीं

पलटने वाले परिंदों पे बद-हवासी है
मैं इस ज़मीं का कहीं आख़िरी शजर तो नहीं

बुलंद होते हुए देख ले ज़मीं की तरफ़
कि तेरे पाँव के नीचे किसी का सर तो नहीं

किसी के हक़ में मैं झूटी गवाही क्यों दे दूँ
कोई भी हो मेरे लफ़्ज़ों से मो'तबर तो नहीं

पहाड़ पेड़ नदी साथ दे रहे हैं मिरा
ये तेरी ओर मिरा आख़िरी सफ़र तो नहीं

‘अजीब शोर सा उठता है मेरे सीने में
मेरे 'अलावा कोई और नौहागर तो नहीं