उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mera yaqin kahin tha mera guman kahin

मिरा यक़ीन कहीं था मिरा गुमान कहीं

مرا یقین کہیں تھا مرا گمان کہیں

शायर: Badr Muneer6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरा यक़ीन कहीं था मिरा गुमान कहीं
मैं खो गया इन्ही दोनों के दरमियान कहीं

सुख़न-तराज़ हुआ हूँ मैं अपने दिल के ख़िलाफ़
चिपक न जाए मिरे नुत्क़ से ज़बान कहीं

इसी लिए तो कभी मुजतमा' न हो पाया
मिरा ज़मान कहीं था मिरा मकान कहीं

मिज़ाज-ए-दहर नहीं ए'तिदाल पर साहिब
चली न जाए मिरे शहर से अमान कहीं

बयान करने लगा हूँ शिकस्तगी दिल की
चला न जाए तिरी सम्त मेरा ध्यान कहीं

कमंद डाल रहा है दिलों पे ख़ौफ़ 'मुनीर'
सिमट न जाए परों में मिरी उड़ान कहीं