उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere makan se kash ye manzar dikhai de

मेरे मकाँ से काश ये मंज़र दिखाई दे

میرے مکاں سے کاش یہ منظر دکھائی دے

शायर: Badiuzzaman Khawar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मेरे मकाँ से काश ये मंज़र दिखाई दे
हरियालियों के बीच तिरा घर दिखाई दे

चेहरा किसी का चाहे लगे माहताब सा
जाओ न इतने पास कि पत्थर दिखाई दे

उस शख़्स को सदाओं से पहचान जाइए
जिस शख़्स का न जिस्म न पैकर दिखाई दे

आता है और कौन हवा के सिवा यहाँ
इस दश्त में कहाँ से कोई घर दिखाई दे

तू मेरी ज़ात में कभी झाँके तो क्या 'अजब
तेरे सिवा न कुछ मिरे अंदर दिखाई दे

ज़ख़्मों को नाप लेता है किस तरह देखिए
ये दिल जो बहर-ए-ग़म का शनावर दिखाई दे

चल कर अब ऐसे शहर में कुछ दिन गुज़ारिए
'ख़ावर' जहाँ न कोई सुख़नवर दिखाई दे