उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mera saya bhi agar bab-e-tarab tak aaya

मेरा साया भी अगर बाब-ए-तरब तक आया

میرا سایہ بھی اگر باب طرب تک آیا

शायर: Osama Khalid5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मेरा साया भी अगर बाब-ए-तरब तक आया
कहना बदनाम-ए-ज़माना था नसब तक आया

धुंद ही धुंद थी हर सम्त फिर इक सम्त से मैं
सामने दिखता हुआ अपने अक़ब तक आया

बद-नसीबी में यही बात बुरी है यही बात
कोई भी ज़हर नहीं मेरी तलब तक आया

हाथ आई हुई इक मौज-ए-फ़ना फैल गई
जब कोई झोंका तिरे जान-ब-लब तक आया

शर्म से भीगी हुई पोरों में अटका हुआ झूट
कभी पेशानी तक आया कभी लब तक आया