उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maqam-e-shukr ki unwan-e-guftugu hue hum

मक़ाम-ए-शुक्र कि 'उन्वान-ए-गुफ़्तुगू हुए हम

مقام شکر کہ عنوان گفتگو ہوئے ہم

शायर: Iftikhar Arif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मक़ाम-ए-शुक्र कि 'उन्वान-ए-गुफ़्तुगू हुए हम
यही बहार के दिन थे कि सुर्ख़-रू हुए हम

अभी कहीं भी नहीं थे मगर किसी की 'अता
किसी का फ़ैज़ कि 'आलम में चार-सू हुए हम

नवेद-ए-नुसरत-ओ-फ़त्ह-ए-मुबीं जिलौ में रही
कुछ इस यक़ीन से दुश्मन के रू-ब-रू हुए हम

अँधेरी रात उड़ाती रही ग़ुबार-ए-सियाह
दु'आ-ए-नूर के साए में शो'ला-रू हम

मिसाल-ए-सब्ज़ा-ए-नौरुस्ता सर-बुलंद रहे
न सर-निगूँ कभी ठहरे न बे-नुमू हुए हम

कोई तो बात हम आशुफ़्तगाँ में ऐसी थी
कि ख़ाक हो के भी मे'यार-ए-आबरू हुए हम

बस एक चश्म-ए-ख़ुश-इक़बाल की तवज्जोह से
नज़र में आए निगह-दार-ए-रंग-ओ-बू हुए हम