उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main taKHliq-e-sharar karta hun apne soz-e-pinhan se

मैं तख़्लीक़-ए-शरर करता हूँ अपने सोज़-ए-पिन्हाँ से

میں تخلیق شرر کرتا ہوں اپنے سوز پنہاں سے

शायर: Ehsan Darbhangavi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं तख़्लीक़-ए-शरर करता हूँ अपने सोज़-ए-पिन्हाँ से
मैं परवाना नहीं जो आग लूँ हर शम-ए-सोज़ाँ से

किया वहशत ने अक़्ल-ओ-इश्क़ में इक रब्त-ए-नौ पैदा
गए वो दिन के दीवाने उलझते थे गरेबाँ से

न जाने इम्तिहाँ है आज किस की ना-ख़ुदाई का
कि जो भी मौज उठती है वो बढ़ जाती है तूफ़ाँ से

कशिश मंज़िल की दामन खींचती थी वर्ना मुश्किल था
गुज़रना फ़स्ल-ए-गुल में बे-नियाज़ाना गुलिस्ताँ से

कहें क्या हम कहाँ आ के तिरे वहशी ने दम तोड़ा
ख़िरद समझा-बुझा के ले तो आई थी बयाबाँ से

ब-क़ौल उस्ताद के 'एहसाँ' है सूना दिल का काशाना
चलो थोड़ी सी रौनक़ माँग लाएँ बज़्म-ए-जानाँ से