उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mai-kade ki shart daur-e-baada-o-saghar ki qaid

मय-कदे की शर्त दौर-ए-बादा-ओ-साग़र की क़ैद

میکدے کی شرط دور بادہ و ساغر کی قید

शायर: Saba Naqvi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मय-कदे की शर्त दौर-ए-बादा-ओ-साग़र की क़ैद
एक मेरी तिश्नगी और उस पे दुनिया भर की क़ैद

इश्क़ में सहरा-नवर्दी का बहाना चाहिए
वहशत-ए-दिल के लिए अच्छी नहीं है घर की क़ैद

मावरा-ए-अर्श है मेरे तख़य्युल की उड़ान
हर्फ़-ए-बे-मा'नी समझता हूँ मैं बाल-ओ-पर की क़ैद

दाई'-ए-सोज़-ए-जिगर हो क्यों न परवाने की ख़ाक
शम-ए-महफ़िल के लिए है मोम के पैकर की क़ैद

ज़िंदगी का मा-हसल है इज़्तिराब-ए-ज़िंदगी
जादा-ए-उलफ़त में लाज़िम है दिल-ए-मुज़्तर की क़ैद

आदमी की ख़्वाब-गाहें हैं सलीब-ओ-तेग़ भी
नींद से बे-ताब आँखों को नहीं बिस्तर की क़ैद

क्या जहान-ए-रंग-ओ-निकहत की क़सम काफ़ी न थी
क्यों पए-सौगंद रखी तुम ने अपने सर की क़ैद

वक़्त के सैल-ए-रवाँ के सामने कुछ भी नहीं
बादबान-ए-अज़्म की बंदिश हो या लंगर की क़ैद

सर-ब-सज्दा जब कभी शौक़-ए-जबीं-साई हुआ
जज़्ब-ए-उल्फ़त ने लगा दी उस के संग-ए-दर की क़ैद

क्या किसी दरिया की लहरें गिन नहीं सकता था मैं
ख़्वाब में रक्खी गई क्यों रेत के मंज़र की क़ैद

मेरी नज़रों में मोहब्बत वो इबादत है 'सबा'
जिस इबादत में नहीं है फूल और पत्थर की क़ैद