उर्दू शायरी · ग़ज़ल

lab pe mai ka ayagh rahta hai

लब पे मय का अयाग़ रहता है

لب پہ مے کا ایاغ رہتا ہے

शायर: Laeeq Akbar Sahaab6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लब पे मय का अयाग़ रहता है
होश में कब दिमाग़ रहता है

'इश्क़ दिल में समा गया जब से
दिल में रौशन चराग़ रहता है

ज़ख़्म ख़ंजर का या ज़बाँ का हो
भर भी जाए तो दाग़ रहता है

उलझे रिश्तों की तल्ख़ उलझन से
उलझा उलझा दिमाग़ रहता है

जाने किस ख़ाक से बना हूँ मैं
मुज़्तरिब दिल-दिमाग़ रहता है

वस्ल के जब 'सहाब' महकें गुल
दिल मिरा बाग़-बाग़ रहता है