उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kyun qatl ke arman mein aazar uThaen

क्यूँ क़त्ल के अरमान में आज़ार उठाएँ

کیوں قتل کے ارمان میں آزار اٹھائیں

शायर: Hafeez Shahid9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्यूँ क़त्ल के अरमान में आज़ार उठाएँ
गर्दन मिरी हाज़िर है वो तलवार उठाएँ

रोके से मिरी तब-ए-रवाँ रुक न सकेगी
रस्ते में मिरे लाख वो दीवार उठाएँ

जो दिल में तुम्हारे है बता क्यूँ नहीं देते
सदमा जो उठाना है तो यकबार उठाएँ

क्यूँ लोग हैं ख़ामोश ज़बूँ-हाल पे अपने
आवाज़ सर-ए-कूचा-ओ-बाज़ार उठाएँ

ख़ुद ही जो पस-ए-पर्दा-ए-असरार छुपे हैं
वो कैसे भला पर्दा-ए-असरार उठाएँ

नीलाम जो करते हैं यहाँ जिंस-ए-वफ़ा को
मुमकिन ही नहीं नाज़-ए-ख़रीदार उठाएँ

ये जुर्म-ए-मोहब्बत नहीं वाइ'ज़ का मुक़द्दर
ये बार-ए-गुनाह हम से गुनहगार उठाएँ

फिरते हैं जो आज़ाद उन्हें कैसे ख़बर हो
ज़िंदाँ में जो तकलीफ़-ए-गिरफ़्तार उठाएँ

'शाहिद' यही लिक्खा है मुक़द्दर में हमारे
सदमात ज़माने में लगातार उठाएँ